महाभारत 13.16.29
देवासुरमनुष्याणां यच्च गुह्यं सनातनम्गुहायां निहितं ब्रह्म दुर्विज्ञेयं सुरैरपि
devāsuramanuṣyāṇāṃ yacca guhyaṃ sanātanamguhāyāṃ nihitaṃ brahma durvijñeyaṃ surairapi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें