महाभारत 13.16.55एतत्परममानन्दं यत्तच्छाश्वतमेव चएषा गतिर्विरक्तानामेष भावः परः सताम्etatparamamānandaṃ yattacchāśvatameva caeṣā gatirviraktānāmeṣa bhāvaḥ paraḥ satāmइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें