महाभारत 13.17.62
सर्वावासः सर्वचारी दुर्वासा वासवोऽमरःहेमो हेमकरो यज्ञः सर्वधारी धरोत्तमः
sarvāvāsaḥ sarvacārī durvāsā vāsavo'maraḥhemo hemakaro yajñaḥ sarvadhārī dharottamaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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