महाभारत 13.2.55
सा तु राजसुता स्मृत्वा भर्तुर्वचनमादितःतथेति लज्जमाना सा तमुवाच द्विजर्षभम्
sā tu rājasutā smṛtvā bharturvacanamāditaḥtatheti lajjamānā sā tamuvāca dvijarṣabham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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