महाभारत 13.2.5
मनोः प्रजापते राजन्निक्ष्वाकुरभवत्सुतःतस्य पुत्रशतं जज्ञे नृपतेः सूर्यवर्चसः
manoḥ prajāpate rājannikṣvākurabhavatsutaḥtasya putraśataṃ jajñe nṛpateḥ sūryavarcasaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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