महाभारत 13.2.66
कूटमुद्गरहस्तस्तु मृत्युस्तं वै समन्वयात्हीनप्रतिज्ञमत्रैनं वधिष्यामीति चिन्तयन्
kūṭamudgarahastastu mṛtyustaṃ vai samanvayāthīnapratijñamatrainaṃ vadhiṣyāmīti cintayan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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