महाभारत 13.2.70
प्राणा हि मम दाराश्च यच्चान्यद्विद्यते वसुअतिथिभ्यो मया देयमिति मे व्रतमाहितम्
prāṇā hi mama dārāśca yaccānyadvidyate vasuatithibhyo mayā deyamiti me vratamāhitam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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