महाभारत 13.21.14
अष्टावक्र उवाच · aṣṭāvakra uvāca
हरन्ति दोषजातानि नरं जातं यथेच्छकम्प्रभवामि सदा धृत्या भद्रे स्वं शयनं व्रज
haranti doṣajātāni naraṃ jātaṃ yathecchakamprabhavāmi sadā dhṛtyā bhadre svaṃ śayanaṃ vraja
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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