महाभारत 13.26.39
कपोतके नरः स्नात्वा अष्टावक्रे कृतोदकःद्वादशाहं निराहारो नरमेधफलं लभेत्
kapotake naraḥ snātvā aṣṭāvakre kṛtodakaḥdvādaśāhaṃ nirāhāro naramedhaphalaṃ labhet
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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