महाभारत 13.26.42
पुरापवर्तनं नन्दां महानन्दां च सेव्य वैनन्दने सेव्यते दान्तस्त्वप्सरोभिरहिंसकः
purāpavartanaṃ nandāṃ mahānandāṃ ca sevya vainandane sevyate dāntastvapsarobhirahiṃsakaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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