महाभारत 13.26.47नर्मदायामुपस्पृश्य तथा सूर्पारकोदकेएकपक्षं निराहारो राजपुत्रो विधीयतेnarmadāyāmupaspṛśya tathā sūrpārakodakeekapakṣaṃ nirāhāro rājaputro vidhīyateइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें