महाभारत 13.27.55
गङ्गोर्मिभिरथो दिग्धः पुरुषं पवनो यदास्पृशते सोऽपि पाप्मानं सद्य एवापमार्जति
gaṅgormibhiratho digdhaḥ puruṣaṃ pavano yadāspṛśate so'pi pāpmānaṃ sadya evāpamārjati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें