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महाभारत 13.31.5
भीष्म उवाच · bhīṣma uvāca
शृणु राजन्यथा राजा वीतहव्यो महायशाःक्षत्रियः सन्पुनः प्राप्तो ब्राह्मण्यं लोकसत्कृतम्
śṛṇu rājanyathā rājā vītahavyo mahāyaśāḥkṣatriyaḥ sanpunaḥ prāpto brāhmaṇyaṃ lokasatkṛtam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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