महाभारत 13.32.33
तस्मात्त्वमपि कौन्तेय पितृदेवद्विजातिथीन्सम्यक्पूजय येन त्वं गतिमिष्टामवाप्स्यसि
tasmāttvamapi kaunteya pitṛdevadvijātithīnsamyakpūjaya yena tvaṃ gatimiṣṭāmavāpsyasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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