महाभारत 13.40.56
नेत्राभ्यां नेत्रयोरस्या रश्मीन्संयोज्य रश्मिभिःविवेश विपुलः कायमाकाशं पवनो यथा
netrābhyāṃ netrayorasyā raśmīnsaṃyojya raśmibhiḥviveśa vipulaḥ kāyamākāśaṃ pavano yathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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