महाभारत 13.42.24
एवं संचिन्तयन्नेव विपुलो राजसत्तमअवाङ्मुखो न्यस्तशिरा दध्यौ दुष्कृतमात्मनः
evaṃ saṃcintayanneva vipulo rājasattamaavāṅmukho nyastaśirā dadhyau duṣkṛtamātmanaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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