महाभारत 13.43.7
कुर्वाणं हि नरं कर्म पापं रहसि सर्वदापश्यन्ति ऋतवश्चापि तथा दिननिशेऽप्युत
kurvāṇaṃ hi naraṃ karma pāpaṃ rahasi sarvadāpaśyanti ṛtavaścāpi tathā dinaniśe'pyuta
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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