महाभारत 13.48.31
यदृच्छयोपसंपन्नैर्यज्ञसाधुबहिष्कृतैःबाह्या बाह्यैस्तु जायन्ते यथावृत्ति यथाश्रयम्
yadṛcchayopasaṃpannairyajñasādhubahiṣkṛtaiḥbāhyā bāhyaistu jāyante yathāvṛtti yathāśrayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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