महाभारत 13.48.34
स्वशरीरैः परित्राणं बाह्यानां सिद्धिकारकम्मनुजव्याघ्र भवति तत्र मे नास्ति संशयः
svaśarīraiḥ paritrāṇaṃ bāhyānāṃ siddhikārakammanujavyāghra bhavati tatra me nāsti saṃśayaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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