महाभारत 13.48.8
द्वे चापि भार्ये वैश्यस्य द्वयोरात्मास्य जायतेशूद्रा शूद्रस्य चाप्येका शूद्रमेव प्रजायते
dve cāpi bhārye vaiśyasya dvayorātmāsya jāyateśūdrā śūdrasya cāpyekā śūdrameva prajāyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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