महाभारत 13.50.8
गङ्गा च यमुना चैव सरितश्चानुगास्तयोःप्रदक्षिणमृषिं चक्रुर्न चैनं पर्यपीडयन्
gaṅgā ca yamunā caiva saritaścānugāstayoḥpradakṣiṇamṛṣiṃ cakrurna cainaṃ paryapīḍayan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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