महाभारत 13.52.31
न प्रबोध्योऽस्मि संसुप्त इत्युवाचाथ भार्गवःसंवाहितव्यौ पादौ मे जागर्तव्यं च वां निशि
na prabodhyo'smi saṃsupta ityuvācātha bhārgavaḥsaṃvāhitavyau pādau me jāgartavyaṃ ca vāṃ niśi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें