महाभारत 13.52.32
अविशङ्कश्च कुशिकस्तथेत्याह स धर्मवित्न प्रबोधयतां तं च तौ तदा रजनीक्षये
aviśaṅkaśca kuśikastathetyāha sa dharmavitna prabodhayatāṃ taṃ ca tau tadā rajanīkṣaye
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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