महाभारत 13.52.35
स तु राजा निराहारः सभार्यः कुरुनन्दनपर्युपासत तं हृष्टश्च्यवनाराधने रतः
sa tu rājā nirāhāraḥ sabhāryaḥ kurunandanaparyupāsata taṃ hṛṣṭaścyavanārādhane rataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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