महाभारत 13.53.27
तथेति च प्राह नृपो निर्विशङ्कस्तपोधनम्क्रीडारथोऽस्तु भगवन्नुत सांग्रामिको रथः
tatheti ca prāha nṛpo nirviśaṅkastapodhanamkrīḍāratho'stu bhagavannuta sāṃgrāmiko rathaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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