महाभारत 13.53.46
अहो भगवतो वीर्यं महर्षेर्भावितात्मनःराज्ञश्चापि सभार्यस्य धैर्यं पश्यत यादृशम्
aho bhagavato vīryaṃ maharṣerbhāvitātmanaḥrājñaścāpi sabhāryasya dhairyaṃ paśyata yādṛśam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें