महाभारत 13.54.15
तं दृष्ट्वात्यद्भुतं राजा मनसाचिन्तयत्तदास्वप्नोऽयं चित्तविभ्रंश उताहो सत्यमेव तु
taṃ dṛṣṭvātyadbhutaṃ rājā manasācintayattadāsvapno'yaṃ cittavibhraṃśa utāho satyameva tu
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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