महाभारत 13.55.16
यदा त्वया सभार्येण संसुप्तो न प्रबोधितःअहं तदैव ते प्रीतो मनसा राजसत्तम
yadā tvayā sabhāryeṇa saṃsupto na prabodhitaḥahaṃ tadaiva te prīto manasā rājasattama
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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