महाभारत 13.57.7
रहस्यमद्भुतं चैव शृणु वक्ष्यामि यत्त्वयिया गतिः प्राप्यते येन प्रेत्यभावेषु भारत
rahasyamadbhutaṃ caiva śṛṇu vakṣyāmi yattvayiyā gatiḥ prāpyate yena pretyabhāveṣu bhārata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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