महाभारत 13.6.12
तपसा रूपसौभाग्यं रत्नानि विविधानि चप्राप्यते कर्मणा सर्वं न दैवादकृतात्मना
tapasā rūpasaubhāgyaṃ ratnāni vividhāni caprāpyate karmaṇā sarvaṃ na daivādakṛtātmanā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें