महाभारत 13.6.42
पापमुत्सृजते लोके सर्वं प्राप्य सुदुर्लभम्लोभमोहसमापन्नं न दैवं त्रायते नरम्
pāpamutsṛjate loke sarvaṃ prāpya sudurlabhamlobhamohasamāpannaṃ na daivaṃ trāyate naram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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