महाभारत 13.6.6
यादृशं वपते बीजं क्षेत्रमासाद्य कर्षकःसुकृते दुष्कृते वापि तादृशं लभते फलम्
yādṛśaṃ vapate bījaṃ kṣetramāsādya karṣakaḥsukṛte duṣkṛte vāpi tādṛśaṃ labhate phalam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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