महाभारत 13.61.28
हलकृष्टां महीं दत्त्वा सबीजां सफलामपिउदीर्णं वापि शरणं तथा भवति कामदः
halakṛṣṭāṃ mahīṃ dattvā sabījāṃ saphalāmapiudīrṇaṃ vāpi śaraṇaṃ tathā bhavati kāmadaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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