महाभारत 13.61.57
रत्नोपकीर्णां वसुधां यो ददाति पुरंदरस मुक्तः सर्वकलुषैः स्वर्गलोके महीयते
ratnopakīrṇāṃ vasudhāṃ yo dadāti puraṃdarasa muktaḥ sarvakaluṣaiḥ svargaloke mahīyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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