महाभारत 13.65.21
देवा ऊचुःभगवन्कृतकामाः स्मो यक्ष्यामस्त्वाप्तदक्षिणैःइमं तु देशं मुनयः पर्युपासन्त नित्यदा
devā ūcuḥbhagavankṛtakāmāḥ smo yakṣyāmastvāptadakṣiṇaiḥimaṃ tu deśaṃ munayaḥ paryupāsanta nityadā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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