महाभारत 13.65.56
न हिरण्यैर्न वासोभिर्नाश्वदानेन भारतप्राप्नुवन्ति नराः श्रेयो यथेहान्नप्रदाः प्रभो
na hiraṇyairna vāsobhirnāśvadānena bhārataprāpnuvanti narāḥ śreyo yathehānnapradāḥ prabho
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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