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महाभारत 13.67.12
यम उवाच · yama uvāca
नाहं कालस्य विहितं प्राप्नोमीह कथंचनयो हि धर्मं चरति वै तं तु जानामि केवलम्
nāhaṃ kālasya vihitaṃ prāpnomīha kathaṃcanayo hi dharmaṃ carati vai taṃ tu jānāmi kevalam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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