महाभारत 13.69.31
ब्राह्मणस्वं न हर्तव्यं पुरुषेण विजानताब्राह्मणस्वं हृतं हन्ति नृगं ब्राह्मणगौरिव
brāhmaṇasvaṃ na hartavyaṃ puruṣeṇa vijānatābrāhmaṇasvaṃ hṛtaṃ hanti nṛgaṃ brāhmaṇagauriva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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