महाभारत 13.69.6
खमावृत्योदपानस्य कृकलासः स्थितो महान्तस्य नास्ति समुद्धर्तेत्यथ कृष्णे न्यवेदयन्
khamāvṛtyodapānasya kṛkalāsaḥ sthito mahāntasya nāsti samuddhartetyatha kṛṣṇe nyavedayan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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