महाभारत 13.77.19
सार्द्रचर्मणि भुञ्जीत निरीक्षन्वारुणीं दिशम्वाग्यतः सर्पिषा भूमौ गवां व्युष्टिं तथाश्नुते
sārdracarmaṇi bhuñjīta nirīkṣanvāruṇīṃ diśamvāgyataḥ sarpiṣā bhūmau gavāṃ vyuṣṭiṃ tathāśnute
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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