महाभारत 13.77.20
घृतेन जुहुयादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचयेत्घृतं दद्याद्घृतं प्राशेद्गवां व्युष्टिं तथाश्नुते
ghṛtena juhuyādagniṃ ghṛtena svasti vācayetghṛtaṃ dadyādghṛtaṃ prāśedgavāṃ vyuṣṭiṃ tathāśnute
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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