महाभारत 13.77.8
सायं प्रातश्च सततं होमकाले महामतेगावो ददति वै होम्यमृषिभ्यः पुरुषर्षभ
sāyaṃ prātaśca satataṃ homakāle mahāmategāvo dadati vai homyamṛṣibhyaḥ puruṣarṣabha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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