महाभारत 13.8.2
उत्तमापद्गतस्यापि यत्र ते वर्तते मनःमनुष्यलोके सर्वस्मिन्यदमुत्रेह चाप्युत
uttamāpadgatasyāpi yatra te vartate manaḥmanuṣyaloke sarvasminyadamutreha cāpyuta
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें