महाभारत 13.83.36
वसिष्ठ उवाच · vasiṣṭha uvāca
देवतास्ते प्रयच्छन्ति सुवर्णं ये ददत्युतअग्निर्हि देवताः सर्वाः सुवर्णं च तदात्मकम्
devatāste prayacchanti suvarṇaṃ ye dadatyutaagnirhi devatāḥ sarvāḥ suvarṇaṃ ca tadātmakam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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