महाभारत 13.83.44
अपत्यं युवयोर्देव बलवद्भविता प्रभोतन्नूनं त्रिषु लोकेषु न किंचिच्छेषयिष्यति
apatyaṃ yuvayordeva balavadbhavitā prabhotannūnaṃ triṣu lokeṣu na kiṃciccheṣayiṣyati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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