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महाभारत 13.85.11
स्कन्नमात्रं च तच्छुक्रं स्रुवेण प्रतिगृह्य सःआज्यवन्मन्त्रवच्चापि सोऽजुहोद्भृगुनन्दन
skannamātraṃ ca tacchukraṃ sruveṇa pratigṛhya saḥājyavanmantravaccāpi so'juhodbhṛgunandana
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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