महाभारत 13.89.14
बहुरूप्यकृतं वित्तं विन्दते रेवतीं श्रितःअश्वांश्चाश्वयुजे वेत्ति भरणीष्वायुरुत्तमम्
bahurūpyakṛtaṃ vittaṃ vindate revatīṃ śritaḥaśvāṃścāśvayuje vetti bharaṇīṣvāyuruttamam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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