महाभारत 13.89.2
श्राद्धं यः कृत्तिकायोगे कुर्वीत सततं नरःअग्नीनाधाय सापत्यो यजेत विगतज्वरः
śrāddhaṃ yaḥ kṛttikāyoge kurvīta satataṃ naraḥagnīnādhāya sāpatyo yajeta vigatajvaraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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