महाभारत 13.90.47
यः सहस्रं सहस्राणां भोजयेदनृचां नरःएकस्तान्मन्त्रवित्प्रीतः सर्वानर्हति भारत
yaḥ sahasraṃ sahasrāṇāṃ bhojayedanṛcāṃ naraḥekastānmantravitprītaḥ sarvānarhati bhārata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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