महाभारत 13.92.2
ऋषयो धर्मनित्यास्तु कृत्वा निवपनान्युततर्पणं चाप्यकुर्वन्त तीर्थाम्भोभिर्यतव्रताः
ṛṣayo dharmanityāstu kṛtvā nivapanānyutatarpaṇaṃ cāpyakurvanta tīrthāmbhobhiryatavratāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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